निर्वाचन आयोग के तीन आयुक्त नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान

निर्वाचन आयोग पर बढ़ा विवाद: SIR, वोटर लिस्ट और दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से उठे बड़े सवाल

भारत में चुनावी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर राजनीतिक और संस्थागत बहस तेज हो गई है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले निर्वाचन आयोग के कामकाज को लेकर सामने आई एक जांच रिपोर्ट ने वोटर लिस्ट के प्रबंधन, चुनावी डेटा तक पहुंच और आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।

मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि निर्वाचन आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके कामकाज को लेकर सामान्य तौर पर सामूहिक निर्णय प्रक्रिया की अपेक्षा की जाती है। हालिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में कई फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। निर्वाचन आयोग ने हालांकि इन रिपोर्टों के बाद कहा कि SIR और अन्य महत्वपूर्ण फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से लिए गए थे।

इस पूरे विवाद का केंद्र Special Intensive Revision यानी SIR, मतदाता सूची का डिजिटल प्रबंधन और नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े नियम हैं।

तीन सदस्यीय निर्वाचन आयोग में निर्णय कैसे लिए जाते हैं?

भारत का निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत गठित संवैधानिक संस्था है। इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं। आयोग की संरचना का उद्देश्य चुनावों से जुड़े महत्वपूर्ण फैसलों को संस्थागत प्रक्रिया के तहत संचालित करना है।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त आयोग के प्रमुख होते हैं, लेकिन निर्वाचन आयोग को केवल एक व्यक्ति की संस्था के रूप में नहीं देखा जाता। चुनावी मामलों में आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और बहुमत के आधार पर फैसले लेने की व्यवस्था महत्वपूर्ण है।

इसी वजह से हालिया विवाद में सबसे बड़ा सवाल यह बना है कि क्या कुछ प्रशासनिक और तकनीकी फैसलों को लेकर आयोग के सभी सदस्यों के बीच पर्याप्त जानकारी और सहमति थी।

The Indian Express की जांच के अनुसार, संधू और जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार विभिन्न मुद्दों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इनमें मतदाता जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया, चुनावी डेटा तक पहुंच और आयोग के आईटी सिस्टम से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं।

SIR के दौरान 13 करोड़ से ज्यादा नाम draft rolls से हटे

Credit: Wikimedia Commons

SIR इस विवाद का सबसे बड़ा हिस्सा है। निर्वाचन आयोग की इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची की समीक्षा और उसे अपडेट करना है। हालांकि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम draft electoral rolls से हटाए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ।

सितंबर की शुरुआत में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में draft rolls से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके थे। यह संख्या अपने आप में बड़ी है, लेकिन केवल नाम हटने का अर्थ यह नहीं है कि सभी संबंधित लोगों का मतदान अधिकार स्थायी रूप से समाप्त हो गया। कई मामलों में दावे, आपत्तियां और पुनः शामिल किए जाने की प्रक्रिया भी चलती है।

यही अंतर इस पूरे विवाद को समझने में महत्वपूर्ण है। विपक्षी दल इसे बड़े पैमाने पर मतदाता अधिकारों के संकट के रूप में देख रहे हैं, जबकि निर्वाचन आयोग SIR को मतदाता सूची की समीक्षा और शुद्धिकरण की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है।

चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों से क्यों बढ़ा विवाद?

विवाद तब और बढ़ गया जब दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों की जानकारी सार्वजनिक हुई।

रिपोर्ट के अनुसार, संधू और जोशी ने ऐसी प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए जिनसे मतदाता डेटाबेस और electoral roll management की जिम्मेदारियां अधिक केंद्रीकृत होने की आशंका जताई गई थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि कुछ मामलों में ऐसे निर्णय या communication सामने आए जिन पर दोनों आयुक्तों ने आपत्ति दर्ज की।

एक महत्वपूर्ण मुद्दा चुनावी डेटा के डिजिटल सिस्टम तक पहुंच का था। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ अधिकारियों ने चिंता जताई कि स्थानीय Electoral Registration Officers यानी EROs के पास मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े पर्याप्त अधिकार या तकनीकी पहुंच नहीं रह गई थी।

हालांकि निर्वाचन आयोग ने इन रिपोर्टों को अलग तरीके से देखा। आयोग की ओर से कहा गया कि अलग-अलग स्तर पर अधिकारियों द्वारा observations या objections दर्ज करना संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है और महत्वपूर्ण फैसले तीनों आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे।

Goa में 97 मतदाताओं का मामला

इस विवाद का एक उदाहरण Goa से सामने आया।

रिपोर्ट के अनुसार, 97 मतदाताओं के मामलों की जांच के बाद स्थानीय अधिकारियों ने पाया कि वे आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कर चुके थे और उन्हें मतदाता सूची में बनाए रखने योग्य माना गया। लेकिन जिस डिजिटल सिस्टम पर प्रक्रिया चल रही थी, उसमें पहले दर्ज deletion decision को reverse करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था।

इसके कारण स्थानीय अधिकारियों के लिए अपनी जांच के बाद लिए गए निर्णय को सिस्टम में दर्ज करना मुश्किल हो गया। रिपोर्ट में बताया गया कि Goa के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने इस समस्या को लेकर निर्वाचन आयोग से कई बार संपर्क किया।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक बड़ा प्रशासनिक सवाल सामने आया अगर कानून के तहत स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारी किसी मतदाता के दस्तावेजों की जांच करते हैं, लेकिन तकनीकी प्रणाली उन्हें अपने निर्णय को दर्ज या सुधारने की अनुमति नहीं देती, तो अंतिम नियंत्रण वास्तव में किस स्तर पर रह जाता है?

Form 6 में बदलाव को लेकर भी उठे सवाल

नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 में किए गए बदलाव ने भी विवाद को जन्म दिया।

रिपोर्ट के मुताबिक, Form 6 में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त declaration जोड़ा गया था। आवेदक से पूछा गया कि क्या उसका नाम पिछली SIR वाली मतदाता सूची में था, क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस सूची में था, या इनमें से किसी का नाम नहीं था।

रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई 2026 में इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की और कहा कि Form 6 एक statutory form है, जिसे Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित किया गया है। उनके अनुसार इसमें बदलाव के लिए संबंधित नियमों में आवश्यक संशोधन की जरूरत होगी। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस आपत्ति का समर्थन किया था।

इसके बावजूद बाद में यह नया declaration निर्वाचन आयोग के online portal पर दिखाई दिया। अगस्त में संधू ने फिर इस बदलाव को लेकर आपत्ति दर्ज करते हुए इसे हटाने की मांग की।

यह विवाद खास तौर पर नए और पहली बार वोट डालने वाले युवाओं के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि Form 6 ही मतदाता सूची में नए मतदाता के पंजीकरण की बुनियादी प्रक्रिया का हिस्सा है।

West Bengal में 16 लाख appeals ने बढ़ाई चिंता

West Bengal में SIR प्रक्रिया पहले से ही राजनीतिक विवाद का विषय रही है। इसी दौरान मतदाता सूची में नामों को लेकर एक और सवाल सामने आया।

रिपोर्टों के अनुसार, न्यायिक अधिकारियों की जांच के बाद बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम फिर से सूची में शामिल किए गए। इसके बाद लगभग 16 लाख मतदाताओं के मामलों में appeals दायर किए जाने का मुद्दा सामने आया।

सबसे बड़ा सवाल यह था कि ये appeals आखिर किस स्तर पर और किसके निर्देश पर दाखिल की गईं। रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी इस प्रक्रिया को लेकर जानकारी मांगी थी।

इस मुद्दे ने आयोग के भीतर communication और accountability को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति और जिम्मेदारी तय करने का सवाल अभी विवाद का हिस्सा है।

विपक्ष ने लगाए गंभीर राजनीतिक आरोप

इन घटनाक्रमों के बाद विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयोग के कामकाज पर तीखे सवाल उठाए हैं। कांग्रेस सहित कई विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया है कि मतदाता सूची में बदलाव राजनीतिक रूप से प्रभावित हो सकते हैं और उन्होंने निर्वाचन आयोग में अधिक पारदर्शिता की मांग की है।

राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को “वोट चोरी” जैसे राजनीतिक शब्दों के साथ उठाया है। इन आरोपों को हालांकि आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। किसी राजनीतिक दल का दावा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि चुनावी प्रक्रिया में गैरकानूनी हेरफेर हुआ है।

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और निर्वाचन आयोग ने विपक्ष के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि उसके महत्वपूर्ण फैसले सामूहिक रूप से लिए गए और SIR की प्रक्रिया कानूनी ढांचे के तहत चल रही है।

अब मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया

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विवाद का कानूनी पहलू भी अब महत्वपूर्ण हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कामकाज और SIR से जुड़े एक मामले पर सुनवाई के लिए याचिका स्वीकार की है।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग के कुछ फैसले उस सामूहिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं लिए गए जिनका पालन बहु-सदस्यीय आयोग में अपेक्षित है। इसमें दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों को भी आधार बनाया गया है।

लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि अदालत में याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ आरोपों का सही साबित होना नहीं है। मामले में न्यायिक सुनवाई के बाद ही कानूनी सवालों पर स्पष्टता आएगी।

निर्वाचन आयोग के सामने अब सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का

पूरे विवाद को केवल किसी एक अधिकारी या राजनीतिक दल के खिलाफ आरोपों तक सीमित करना सही तस्वीर नहीं देगा। असली सवाल यह है कि भारत की मतदाता सूची जैसी संवेदनशील व्यवस्था में decision-making, software access, audit trail और accountability कितनी स्पष्ट है।

अगर स्थानीय Electoral Registration Officers किसी निर्णय को बदलना चाहते हैं, तो सिस्टम उन्हें वह अधिकार देता है या नहीं यह साफ होना जरूरी है। इसी तरह, किसी statutory form में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किया गया, इसकी जानकारी भी सार्वजनिक और स्पष्ट होनी चाहिए।

निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर को ECINET software की समीक्षा के लिए एक समिति बनाने और तकनीकी प्रणाली की कानूनी अनुरूपता की जांच कराने की घोषणा की। आयोग ने साथ ही कहा कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और मतदाताओं की सुविधा के लिए कुछ प्रक्रियाओं में बदलाव किए जा रहे हैं।

आगे क्या होगा?

SIR, मतदाता सूची और निर्वाचन आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल अब केवल राजनीतिक बहस तक सीमित नहीं रह गए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, आयोग की software review प्रक्रिया और दावे-आपत्तियों के निपटारे से आने वाले परिणाम इस विवाद की अगली दिशा तय करेंगे।

इस समय सबसे जरूरी बात यह है कि किसी भी पक्ष के राजनीतिक आरोप को अंतिम तथ्य मानने के बजाय दस्तावेजों, आधिकारिक रिकॉर्ड, अदालत के आदेश और निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के आधार पर स्थिति को समझा जाए।

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल एक प्रशासनिक database नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों के मतदान अधिकार से जुड़ी व्यवस्था है। इसलिए इसमें होने वाला हर बदलाव पारदर्शी, audit योग्य और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप होना लोकतांत्रिक भरोसे के लिए महत्वपूर्ण है।

According To

Election Commission of India (ECI) official information on SIR, electoral rolls and voter services: Election Commission of India

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